श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 (दैवासुरसम्पद्विभागयोग): हिंदी अर्थ सहित

श्रीकृष्ण उन गुणों को गिनाते हैं जो व्यक्ति को मुक्ति की ओर ले जाते हैं, निर्भयता और सत्य से लेकर दया और क्षमा तक, और उनके सामने बाँधने वाले लक्षण रखते हैं: दिखावा, घमंड, क्रोध और लोभ। वे बेचैन, सब कुछ पकड़ लेने वाले मन का साफ़ चित्र खींचते हैं, और अंत में काम, क्रोध और लोभ को ऐसे तीन द्वार बताते हैं जिन्हें बंद करना है।

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सुनें: भगवद्गीता अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

मधुर संगीत के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में शांत पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।

अध्याय 16 किस बारे में है

अध्याय 15 में श्रीकृष्ण ने संसार को एक विशाल वृक्ष और स्वयं को परम पुरुष बताया था। अध्याय 16 रोज़ के स्वभाव और चरित्र की बात करता है। यह गीता की सबसे प्रसिद्ध सूचियों में से एक से शुरू होता है (16.1–16.3): “दैवी” स्वभाव के छब्बीस गुण, जो निर्भयता और मन की शुद्धता से शुरू होते हैं और जिनमें सत्य, अहिंसा, क्रोध न करना, सब प्राणियों पर दया, क्षमा और नम्रता शामिल हैं। इनके सामने “आसुरी” लक्षण हैं: दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान (16.4)।

यहाँ “दैवी” और “आसुरी” दो तरह के जीव नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन की दो दिशाएँ हैं: पहली मुक्ति की ओर ले जाती है, दूसरी बंधन की ओर (16.5)। श्रीकृष्ण अर्जुन को भरोसा दिलाते हैं कि वे दैवी स्वभाव लेकर जन्मे हैं, और फिर दूसरी दिशा का विस्तार से वर्णन करते हैं (16.6–16.20): ऐसे लोग जो मानते हैं कि संसार में कोई गहरा सत्य नहीं, जो कभी न भरने वाली इच्छा से चलते हैं, और जिनके मन की बात होती है “आज यह पाया, कल वह पाऊँगा; मेरे बराबर कौन है?” (16.13–16.15)। ऐसे लोगों के नीची योनियों में गिरने वाले श्लोकों को प्राचीन टीकाकार कर्म के नियम का फल मानते हैं, भगवान का क्रोध नहीं।

अध्याय व्यावहारिक सलाह के साथ समाप्त होता है। काम, क्रोध और लोभ विनाश के तीन द्वार हैं, इसलिए इन्हें छोड़ो (16.21); इनसे मुक्त व्यक्ति सच्चा कल्याण करता है और परम गति पाता है (16.22)। जब समझ न आए कि क्या करें, तो क्षणिक इच्छा नहीं, शास्त्र को मार्गदर्शक बनाओ (16.24)। अर्थ के साथ पढ़ने में लगभग 15 मिनट लगते हैं।

श्लोक 16.1–16.5: दैवी और आसुरी गुण

मुक्ति की ओर ले जाने वाले गुण, बाँधने वाले दोष, और अर्जुन को श्रीकृष्ण का भरोसा।

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श्लोक 16.1

श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥

Shri Bhagavan uvacha
abhayam sattva-samshuddhir jnana-yoga-vyavasthitih,
danam damash cha yajnash cha svadhyayas tapa arjavam.

अर्थ: श्रीभगवान ने कहा: निर्भयता, मन की पूरी शुद्धता, ज्ञान और योग में स्थिर रहना, दान, इंद्रियों पर संयम, यज्ञ, शास्त्रों का स्वाध्याय, तप और सीधापन (सरलता);

Meaning: The Lord said: Fearlessness, purity of heart, steadiness in knowledge and yoga, giving, self-restraint, worship, study of the scriptures, self-discipline and straightforwardness;

श्लोक 16.2

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥

Ahimsa satyam akrodhas tyagah shantir apaishunam,
daya bhuteshv aloluptvam mardavam hrir achapalam.

अर्थ: अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शांति, पीठ पीछे किसी की बुराई न करना, सब प्राणियों पर दया, लालच न होना, कोमलता, गलत काम करने में लज्जा, और चंचलता न होना;

Meaning: not harming, truthfulness, freedom from anger, letting go, calm, not speaking ill of others behind their backs, kindness to all beings, freedom from greed, gentleness, a sense of shame at doing wrong, and steadiness;

श्लोक 16.3

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥

Tejah kshama dhritih shaucham adroho natimanita,
bhavanti sampadam daivim abhijatasya bharata.

अर्थ: तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से वैर न रखना और अपने को बहुत बड़ा न मानना; हे भारत (अर्जुन), ये गुण उस व्यक्ति में होते हैं जो दैवी संपदा (दैवी स्वभाव) लेकर जन्मा है।

Meaning: vigour, forgiveness, patience, cleanliness, bearing no malice and not thinking too highly of oneself: these, Arjuna, belong to one who is born with the divine nature.

श्लोक 16.4

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम्॥

Dambho darpo 'bhimanash cha krodhah parushyam eva cha,
ajnanam chabhijatasya partha sampadam asurim.

अर्थ: हे पार्थ, दिखावा (दंभ), घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान, ये उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी संपदा (आसुरी स्वभाव) लेकर जन्मा है।

Meaning: Hypocrisy, arrogance, pride, anger, harshness and ignorance, Arjuna, belong to one who is born with the demonic nature.

श्लोक 16.5

दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥

Daivi sampad vimokshaya nibandhayasuri mata,
ma shuchah sampadam daivim abhijato 'si pandava.

अर्थ: माना गया है कि दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है और आसुरी संपदा बंधन की ओर। हे पाण्डव, चिंता मत करो; तुम दैवी संपदा लेकर जन्मे हो।

Meaning: The divine nature is held to lead to freedom, and the demonic to bondage. Do not worry, Arjuna: you are born with the divine nature.

श्लोक 16.6–16.20: आसुरी मन

बेचैन, सब कुछ पकड़ने वाले और घमंडी मन का चित्र, और वह कहाँ ले जाता है।

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श्लोक 16.6

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥

Dvau bhuta-sargau loke 'smin daiva asura eva cha,
daivo vistarashah prokta asuram partha me shrinu.

अर्थ: इस संसार में प्राणियों की दो तरह की रचना है: दैवी और आसुरी। दैवी का वर्णन विस्तार से हो चुका; हे पार्थ, अब मुझसे आसुरी के बारे में सुनो।

Meaning: There are two kinds of beings in this world, the divine and the demonic. The divine has been described at length; now hear from me about the demonic, Arjuna.

श्लोक 16.7

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥

Pravrittim cha nivrittim cha jana na vidur asurah,
na shaucham napi chacharo na satyam teshu vidyate.

अर्थ: आसुरी स्वभाव वाले लोग नहीं जानते कि किस काम में लगना चाहिए और किससे दूर रहना चाहिए। उनमें न पवित्रता होती है, न अच्छा आचरण, न सत्य।

Meaning: People of demonic nature do not know what to take up and what to turn away from. Neither cleanliness, nor good conduct, nor truth is found in them.

श्लोक 16.8

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥

Asatyam apratishtham te jagad ahur anishvaram,
aparaspara-sambhutam kim anyat kama-haitukam.

अर्थ: वे कहते हैं कि यह जगत असत्य है, इसका कोई आधार नहीं और कोई ईश्वर नहीं। यह बस स्त्री-पुरुष के मेल से पैदा हुआ है; इसका कारण कामना के सिवा और क्या है? (बीच के शब्द को कुछ लोग “बिना किसी क्रम के अपने आप बना” भी पढ़ते हैं।)

Meaning: They say the world has no truth in it, no foundation and no God; that it came about only from the union of male and female, and has no cause but desire. (Some read the middle phrase as “arising without any order of causes”.)

श्लोक 16.9

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥

Etam drishtim avashtabhya nashtatmano 'lpa-buddhayah,
prabhavanty ugra-karmanah kshayaya jagato 'hitah.

अर्थ: इस सोच को पकड़कर, अपने आप को खो चुके और छोटी बुद्धि वाले ये लोग क्रूर कर्म करते हुए संसार के शत्रु बनकर उसके विनाश के लिए उभरते हैं।

Meaning: Holding to this view, lost to themselves and small in understanding, they rise up as enemies of the world, doing cruel deeds that bring it to ruin.

श्लोक 16.10

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥

Kamam ashritya dushpuram dambha-mana-madanvitah,
mohad grihitvasad-grahan pravartante 'shuchi-vratah.

अर्थ: कभी पूरी न होने वाली इच्छा का सहारा लेकर, दिखावे, मान और मद से भरे हुए, मोह के कारण गलत धारणाएँ पकड़कर, वे अशुद्ध संकल्पों के साथ काम में लगते हैं।

Meaning: Clinging to desire that can never be filled, full of hypocrisy, pride and arrogance, grasping wrong ideas out of delusion, they go about their work with impure aims.

श्लोक 16.11

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥

Chintam aparimeyam cha pralayantam upashritah,
kamopabhoga-parama etavad iti nishchitah.

अर्थ: वे अनगिनत चिंताओं में घिरे रहते हैं जो मृत्यु तक साथ नहीं छोड़तीं। इच्छाओं का भोग ही उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है, और वे पक्का मानते हैं कि जीवन बस इतना ही है।

Meaning: Caught in endless worries that last until death, they make the enjoyment of desires their highest aim, sure that this is all there is.

श्लोक 16.12

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥

Asha-pasha-shatair baddhah kama-krodha-parayanah,
ihante kama-bhogartham anyayenartha-sanchayan.

अर्थ: आशा के सैकड़ों फंदों में बँधे, काम और क्रोध के अधीन, वे अपनी इच्छाओं के भोग के लिए गलत तरीकों से धन जमा करने में लगे रहते हैं।

Meaning: Bound by hundreds of ropes of hope, ruled by desire and anger, they try to pile up wealth by unjust means for the sake of their pleasures.

श्लोक 16.13

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥

Idam adya maya labdham imam prapsye manoratham,
idam astidam api me bhavishyati punar dhanam.

अर्थ: (वे सोचते हैं:) “आज मैंने यह पा लिया, अब वह इच्छा पूरी करूँगा। यह धन मेरे पास है, और आगे वह धन भी मेरा हो जाएगा।”

Meaning: (They think:) “Today I gained this; next I will fulfil that wish. This wealth is mine, and that wealth too will be mine later.”

श्लोक 16.14

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥

Asau maya hatah shatrur hanishye chaparan api,
ishvaro 'ham aham bhogi siddho 'ham balavan sukhi.

अर्थ: “वह शत्रु मैंने मार दिया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ही स्वामी हूँ, मैं ही भोगने वाला हूँ; मैं सफल, बलवान और सुखी हूँ।”

Meaning: “That enemy I have killed, and I will kill the others too. I am the master, I am the one who enjoys; I am successful, strong and happy.”

श्लोक 16.15

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥

Adhyo 'bhijanavan asmi ko 'nyo 'sti sadrisho maya,
yakshye dasyami modishya ity ajnana-vimohitah.

अर्थ: “मैं धनी हूँ, ऊँचे कुल का हूँ; मेरे जैसा और कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा।” इस तरह वे अज्ञान से भ्रमित रहते हैं।

Meaning: “I am rich and well-born; who else is like me? I will perform sacrifices, I will give gifts, I will enjoy myself.” So they are deluded by ignorance.

श्लोक 16.16

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥

Aneka-chitta-vibhranta moha-jala-samavritah,
prasaktah kama-bhogeshu patanti narake 'shuchau.

अर्थ: अनेक विचारों में भटके हुए, मोह के जाल में घिरे और भोगों में डूबे हुए वे अशुद्ध नरक में गिरते हैं।

Meaning: Led astray by many thoughts, wrapped in a net of delusion and attached to pleasures, they fall into a foul hell.

श्लोक 16.17

आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥

Atma-sambhavitah stabdha dhana-mana-madanvitah,
yajante nama-yajnais te dambhenavidhi-purvakam.

अर्थ: अपने को ही बड़ा मानने वाले, अकड़े हुए, धन और मान के नशे में चूर, वे केवल नाम के यज्ञ करते हैं, दिखावे के लिए और बिना विधि के।

Meaning: Self-important and stubborn, drunk with wealth and pride, they perform sacrifices in name only, for show, without following the proper way.

श्लोक 16.18

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥

Ahankaram balam darpam kamam krodham cha samshritah,
mam atma-para-deheshu pradvishanto 'bhyasuyakah.

अर्थ: अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का सहारा लेकर, दूसरों में दोष ढूँढने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीर में रहने वाले मुझ (परमात्मा) से द्वेष करते हैं।

Meaning: Leaning on ego, force, arrogance, desire and anger, these fault-finders hate me, who dwell in their own bodies and in the bodies of others.

श्लोक 16.19

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

Tan aham dvishatah kruran samsareshu naradhaman,
kshipamy ajasram ashubhan asurishv eva yonishu.

अर्थ: उन द्वेष करने वाले, क्रूर और अशुभ कर्म करने वाले, मनुष्यों में सबसे नीचे गिरे लोगों को मैं संसार के चक्र में बार-बार आसुरी योनियों (जन्मों) में ही डालता हूँ।

Meaning: Those hateful, cruel people who do harm, the lowest among humans, I cast again and again into demonic births in the round of worldly life.

श्लोक 16.20

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥

Asurim yonim apanna mudha janmani janmani,
mam aprapyaiva kaunteya tato yanty adhamam gatim.

अर्थ: हे कौन्तेय, आसुरी योनि में पड़े वे मोहित लोग जन्म-जन्म में मुझे न पाकर उससे भी नीची गति को जाते हैं।

Meaning: Falling into demonic births, deluded birth after birth, Arjuna, they never reach me and sink to a still lower state.

श्लोक 16.21–16.24: तीन द्वार और मार्गदर्शक

काम, क्रोध और लोभ, बंद करने योग्य तीन द्वार, और कर्म के लिए शास्त्र का मार्गदर्शन।

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श्लोक 16.21

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

Trividham narakasyedam dvaram nashanam atmanah,
kamah krodhas tatha lobhas tasmad etat trayam tyajet.

अर्थ: नरक के तीन द्वार हैं जो मनुष्य का नाश करते हैं: काम (इच्छा), क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

Meaning: There are three gates to hell that ruin a person: desire, anger and greed. So one should give up all three.

श्लोक 16.22

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥

Etair vimuktah kaunteya tamo-dvarais tribhir narah,
acharaty atmanah shreyas tato yati param gatim.

अर्थ: हे कौन्तेय, अंधकार के इन तीन द्वारों से छूटा हुआ मनुष्य वही करता है जो उसके लिए सच में कल्याणकारी है, और फिर परम गति को पाता है।

Meaning: Freed from these three gates of darkness, Arjuna, a person does what is truly good for the self, and then reaches the highest goal.

श्लोक 16.23

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥

Yah shastra-vidhim utsrijya vartate kama-karatah,
na sa siddhim avapnoti na sukham na param gatim.

अर्थ: जो शास्त्र के बताए मार्ग को छोड़कर अपनी मनमानी इच्छा से चलता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख, न परम गति।

Meaning: One who sets aside the guidance of scripture and acts on the impulse of desire gains neither perfection, nor happiness, nor the highest goal.

श्लोक 16.24

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

Tasmach chhastram pramanam te karyakarya-vyavasthitau,
jnatva shastra-vidhanoktam karma kartum iharhasi.

अर्थ: इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह तय करने में शास्त्र ही तुम्हारी कसौटी है। शास्त्र में बताए गए कर्म को जानकर तुम्हें यहाँ अपना कर्म करना चाहिए।

Meaning: So let scripture be your measure in deciding what should and should not be done. Know what scripture lays down, and then do your work here in this world.

पुष्पिका

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः॥

Om tat sad iti shrimad-bhagavad-gitasu upanishatsu brahma-vidyayam yoga-shastre
shri-krishnarjuna-samvade daivasura-sampad-vibhaga-yogo nama shodasho 'dhyayah.

अर्थ: ॐ तत् सत्। इस प्रकार उपनिषद रूपी श्रीमद्भगवद्गीता में, जो ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र है, श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “दैवासुरसम्पद्विभागयोग” नाम का सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ।

Meaning: Om tat sat. Thus ends the sixteenth chapter, called “the yoga of telling apart the divine and the demonic natures”, in the Bhagavad Gita, an Upanishad, the knowledge of Brahman and a scripture of yoga, in the dialogue between Shri Krishna and Arjuna.

सवाल-जवाब

गीता 16.1–3 में कौन-से दैवी गुण बताए गए हैं?

ये छब्बीस हैं: निर्भयता, मन की शुद्धता, ज्ञान और योग में स्थिरता, दान, इंद्रियों पर संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शांति, चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लालच न होना, कोमलता, लज्जा, चंचलता न होना, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, वैर न रखना और अभिमान न होना।

क्या इस अध्याय में “आसुरी” का अर्थ सचमुच के असुर है?

मुख्य रूप से नहीं। श्रीकृष्ण मनुष्य के दो तरह के स्वभाव बता रहे हैं, एक जो मुक्ति की ओर ले जाता है और एक जो बंधन की ओर (16.5)। यहाँ “आसुरी” व्यक्ति वह है जिस पर कभी न खत्म होने वाली इच्छा, घमंड और क्रोध का राज है। हर मनुष्य में दोनों तरह के खिंचाव होते हैं, और यह अध्याय पहले को बढ़ाने और दूसरे को छोड़ने का निमंत्रण है।

गीता 16.21 में नरक के तीन द्वार कौन-से हैं?

काम (इच्छा), क्रोध और लोभ। श्रीकृष्ण इन्हें आत्मा का नाश करने वाले द्वार कहते हैं और तीनों को छोड़ने को कहते हैं; अगला श्लोक कहता है कि इनसे छूटा व्यक्ति सच्चा कल्याण करता है और परम गति पाता है।

गीता 16.24 में शास्त्र को मार्गदर्शक क्यों कहा गया है?

क्योंकि पिछला श्लोक चेतावनी देता है कि केवल इच्छा के आवेग में काम करने से न सफलता मिलती है न सुख। जब हमें समझ न आए कि क्या सही है, तो श्रीकृष्ण हमारी क्षणिक इच्छाओं से बाहर के एक मार्गदर्शक की ओर इशारा करते हैं: शास्त्र का संचित ज्ञान, जिसे अच्छी तरह समझकर रोज़ के कर्म में उतारा जाए।

पाठ और स्रोत

संस्कृत पाठ सार्वजनिक है। हमने सभी 24 श्लोक और पुष्पिका एक-एक करके संस्कृत विकिस्रोत के अध्याय (“भगवद्गीता/दैवासुरसम्पद्विभागयोगः”) और आईआईटी कानपुर की गीता सुपरसाइट (heritage.iitk.ac.in) के पाठ से, जिसे खुला “gita/gita” डेटासेट भी दोहराता है (हमने उसका केवल संस्कृत पाठ लिया), विराम-चिह्न और वर्तनी के अंतर हटाकर प्रोग्राम से मिलाए। जहाँ अंतर है वहाँ हमने गीता प्रेस का पाठ अपनाया है। अंतर: श्लोक 16.19 में हमने गीता प्रेस और आईआईटी कानपुर की तरह “क्रूरान्” लिया है, जहाँ विकिस्रोत में टंकण-भूल है; 16.20 में विकिस्रोत और आईआईटी कानपुर की तरह “आसुरीं योनिम्” लिया है, जहाँ डेटासेट में मात्रा छूटी है; और 16.6 व 16.11 में मानक वर्तनी “शृणु” और “निश्चिताः” रखी है, जहाँ आईआईटी कानपुर और डेटासेट में छोटी वर्तनी-भूल है। 16.1 में विकिस्रोत और गीता प्रेस “सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञान…” को संधि से जोड़ते हैं, जिसे आईआईटी कानपुर अलग लिखता है; हमने जुड़ा रूप रखा है। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ और अर्थ हमारे अपने हैं।

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