आरती · विष्णु
ॐ जय जगदीश हरे: आरती अर्थ सहित
शायद दुनिया में सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली आरती: जगत के स्वामी भगवान विष्णु की प्रार्थना, जो 1870 के दशक में लिखी गई। यहाँ यह हिंदी में, अंग्रेज़ी अक्षरों में और हर पद के सरल अर्थ के साथ है।
सुनें: ॐ जय जगदीश हरे
ताली, घंटी और मंजीरे की हल्की आरती-ताल के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।
यह आरती क्या है
“ॐ जय जगदीश हरे” जगदीश, यानी जगत के स्वामी भगवान विष्णु को संबोधित है। इसे लगभग 1870 में पंजाब के विद्वान और लेखक पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (1837–1881) ने लिखा था, और यह इतनी फैली कि आज भारत और विदेश के मंदिरों और घरों में किसी भी देवता की पूजा हो, अंत में अक्सर यही आरती गाई जाती है।
इसके शब्द सरल और अपनेपन से भरे हैं: तुम ही मेरे माता-पिता हो, मैं और किसकी शरण लूँ; मैं नहीं जानता तुम तक कैसे पहुँचूँ; हाथ उठाओ, मैं तुम्हारे द्वार पर पड़ा हूँ। यह सबसे बढ़कर एक ही चीज़ माँगती है: श्रद्धा-भक्ति बढ़े और संतों की सेवा का अवसर मिले।
कब गाई जाती है
- लगभग हर पूजा के अंत में, अक्सर मुख्य देवता की आरती के बाद।
- गुरुवार और एकादशी: विष्णु जी के दिन।
- सत्यनारायण कथा और गृह प्रवेश में, और कई घरों में रोज़ शाम।
आरती कैसे करें, क्रम से
पंडित जी की ज़रूरत नहीं। आरती हर पूजा का अंतिम भाग है, और इसे अकेले भी, सुबह या शाम, लगभग five मिनट में किया जा सकता है।
- हाथ-मुँह धोकर विष्णु जी के चित्र या मूर्ति के सामने खड़े हों या बैठें।
- एक थाली में घी का दीया या कपूर, थोड़ी रोली और चावल, एक फूल और तुलसी के पत्ते और मिठाई रखें।
- दीया या कपूर जलाएँ। कोई घंटी बजाए, या सब ताली बजाते हुए साथ गाएँ।
- नीचे दी आरती गाएँ और थाली को धीरे-धीरे दाईं ओर (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएँ: चार बार चरणों की ओर, दो बार नाभि की ओर, एक बार मुख की ओर, फिर सात बार पूरे रूप के चारों ओर।
- आख़िरी पद के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर उसे रख दें।
- सब आरती लें: दोनों हथेलियाँ एक पल लौ के ऊपर रखकर आँखों और सिर से लगाएँ। फिर प्रसाद बाँटें।
धुन और कुछ शब्द हर घर में थोड़े अलग होते हैं। जैसे आपके घर में गाई जाती है, वैसे ही गाइए; भाव शब्दों से ज़्यादा मायने रखता है।
ॐ जय जगदीश हरे, अर्थ सहित
पहला पद टेक है: यह शुरू में गाया जाता है और हर पद के बाद दोहराया जाता है।
सवाल-जवाब
ॐ जय जगदीश हरे किसने लिखी?
पंजाब के फिल्लौर के विद्वान पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने, लगभग 1870 में। उनका देहांत 1881 में हुआ, इसलिए यह पाठ बहुत पहले से सार्वजनिक है।
यह आरती किस देवता की है?
जगदीश, यानी जगत के स्वामी विष्णु की। इसके शब्द एक ही परमेश्वर से बात करते हैं, इसलिए परिवार किसी भी देवता की पूजा के बाद इसे गाते हैं।
कुछ पाठों का अंत अलग क्यों होता है?
कई घर अंत में एक पद जोड़ते हैं, “तन मन धन सब कुछ है तेरा… तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा” (मेरा सब कुछ तेरा है; तेरा तुझी को अर्पण)। कुछ छपे पाठ शिवानंद स्वामी के नाम वाले पद से ख़त्म होते हैं, जो दूसरी आरतियों से आया है। हमने वे सात पद दिए हैं जो सब छपे पाठों में हैं।
पाठ और स्रोत
हिंदी पाठ पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (देहांत 1881) की सार्वजनिक आरती है। हर पंक्ति द्रिक पंचांग, भक्ति भारत, शुभ पंचांग और संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के “आरती संग्रह” से मिलाई गई। हमने इनका साझा पाठ लिया है; छोटे पाठांतर: पद 4 में “मैं मूरख फलकामी” या “मैं सेवक तुम स्वामी”, पद 6 में “तुम रक्षक मेरे”, और “दास जनों के संकट” व “अपने शरण लगाओ” जैसी पंक्तियाँ जो कुछ लोग दोहराकर गाते हैं। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ और अर्थ हमारे अपने हैं।
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