आरती · राम
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन: राम जी की आरती-स्तुति अर्थ सहित
तुलसीदास जी के पाँच पद, जो बहुत से घरों में राम जी की आरती के समय गाए जाते हैं: कमल जैसे नेत्रों से धनुष-बाण तक राम जी का चित्र, और यह प्रार्थना कि वे मन में बसें। यहाँ हिंदी में, अंग्रेज़ी अक्षरों में और सरल अर्थ के साथ।
सुनें: श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
ताली, घंटी और मंजीरे की हल्की आरती-ताल के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।
यह स्तुति क्या है
“श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन” (“हे मन, कृपालु श्री रामचन्द्र जी का भजन कर”) असल में एक स्तुति है, यानी प्रशंसा का गीत, दीपक के लिए लिखी गई आरती नहीं। यह रामचरितमानस के रचयिता संत कवि गोस्वामी तुलसीदास (देहांत 1623) की प्रार्थनाओं के संग्रह विनय पत्रिका का 45वाँ पद है। छोटी, सुंदर और गाने में आसान होने से यह वह स्तुति बन गई जो ज़्यादातर परिवार राम जी के सामने दीपक घुमाते हुए गाते हैं, और गीता प्रेस के “आरती संग्रह” में भी यह राम जी की आरतियों में छपी है।
भाषा अवधी है, जिसमें “-अं” पर ख़त्म होने वाले संस्कृत जैसे शब्द हैं। पहले चार पद राम जी का चित्र बनाते हैं: कमल जैसे नेत्र, वर्षा के बादल जैसा साँवला शरीर, पीले वस्त्र, मुकुट और कुंडल, धनुष थामे लंबी भुजाएँ। पाँचवें पद में तुलसीदास अपना नाम लेकर प्रार्थना करते हैं कि राम जी उनके हृदय-कमल में बसें। धीरे गाने में लगभग तीन मिनट लगते हैं।
कब गाई जाती है
- राम नवमी और विजयादशमी (दशहरा): राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की आरती के समय।
- रामायण या सुंदरकांड पाठ के बाद, और रामचरितमानस कथा के अंत में।
- दिवाली पर, जिस दिन राम जी अयोध्या लौटे, और कई घरों में रोज़ शाम।
आरती कैसे करें, क्रम से
पंडित जी की ज़रूरत नहीं। आरती हर पूजा का अंतिम भाग है, और इसे अकेले भी, सुबह या शाम, लगभग पाँच मिनट में किया जा सकता है।
- हाथ-मुँह धोकर राम जी (अक्सर सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी के साथ) के चित्र या मूर्ति के सामने खड़े हों या बैठें।
- एक थाली में घी का दीया या कपूर, थोड़ी रोली और चावल, एक फूल और तुलसी के पत्ते और मिठाई रखें।
- दीया या कपूर जलाएँ। कोई घंटी बजाए, या सब ताली बजाते हुए साथ गाएँ।
- नीचे दी आरती गाएँ और थाली को धीरे-धीरे दाईं ओर (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएँ। घरों में चलन है: चार बार चरणों की ओर, दो बार नाभि की ओर, एक बार मुख की ओर, फिर सात बार पूरे रूप के चारों ओर।
- आख़िरी पद के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर उसे रख दें।
- सब आरती लें: दोनों हथेलियाँ एक पल लौ के ऊपर रखकर आँखों और सिर से लगाएँ। फिर प्रसाद बाँटें।
धुन और कुछ शब्द हर घर में थोड़े अलग होते हैं। जैसे आपके घर में गाई जाती है, वैसे ही गाइए; भाव शब्दों से ज़्यादा मायने रखता है।
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, अर्थ सहित
बहुत से लोग हर पद के बाद पहली पंक्ति को टेक की तरह दोहराते हैं।
सवाल-जवाब
“श्री रामचन्द्र कृपालु” आरती है या स्तुति?
असल में स्तुति: यह तुलसीदास जी की विनय पत्रिका का 45वाँ पद है। राम जी की आरती में यह इतनी गाई जाती है कि ज़्यादातर लोग इसे ही राम जी की आरती कहते हैं, और गीता प्रेस के “आरती संग्रह” में भी यह राम जी की आरतियों में है।
इसे किसने लिखा?
गोस्वामी तुलसीदास ने, जो 16वीं–17वीं सदी के संत कवि थे और जिन्होंने रामचरितमानस लिखा। अंतिम पद में वे अपना नाम लेते हैं (“इति वदति तुलसीदास”)। उनका देहांत 1623 में हुआ, इसलिए यह पाठ सबके लिए है।
“आरती कीजै श्री रघुवर जी की” का क्या?
वह राम जी की एक और प्रसिद्ध आरती है, जिसके रचयिता अज्ञात हैं; उसमें रघुवर (राम) को सत्-चित्-आनंद, दशरथ-कौशल्या के पुत्र और वानरों के सखा कहकर पूजा गया है। गीता प्रेस उसे भी छापती है। दोनों गाई जाती हैं; “श्री रामचन्द्र कृपालु” ज़्यादा पुराना पाठ है, जिसके रचयिता और मूल ग्रंथ ज्ञात हैं।
कुछ पाठों में ज़्यादा पद क्यों होते हैं?
बहुत से लोग रामचरितमानस के बालकांड की वे पंक्तियाँ जोड़ते हैं जहाँ गौरी माता सीता जी को आशीर्वाद देती हैं (“मन जाहि राच्यो मिलहि सो बर…”) और अंत में एक सोरठा। वे भी तुलसीदास जी की हैं, पर दूसरे ग्रंथ से। हमने विनय पत्रिका के इस पद के पाँच छंद दिए हैं।
पाठ और स्रोत
पाठ: विनय पत्रिका, पद 45 (राग गौरी), गोस्वामी तुलसीदास (देहांत 1623), सार्वजनिक। हर पंक्ति गीता प्रेस की विनय पत्रिका (हिंदी भावार्थ सहित), गीता प्रेस के “श्री आरती संग्रह” (भगवान श्रीरामचन्द्र के अंतर्गत) और भक्ति भारत से मिलाई गई। हमने गीता प्रेस की विनय पत्रिका का पाठ लिया है। छोटे पाठांतर: “छवि” की जगह “छबि”, “उदारु” की जगह “उदार”, “-अं” वाले अंत “-म्” से लिखे जाना, और “भजुमन” मिलाकर लिखा जाना। भक्ति भारत अंत में रामचरितमानस की वे पंक्तियाँ भी जोड़ता है जिनमें गौरी माता सीता जी को आशीर्वाद देती हैं; उन्हें हमने नहीं लिया। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ और अर्थ हमारे अपने हैं।
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