मंत्र · सविता (सूर्य)

गायत्री मंत्र: अर्थ, शब्द-दर-शब्द, और जप की विधि

ऋग्वेद का तीन पंक्तियों का एक मंत्र, जो शायद भारत में सबसे ज़्यादा जपी जाने वाली प्रार्थना है। यह केवल एक चीज़ माँगता है: कि दिव्य प्रकाश हमारी बुद्धि को जगाए।

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सुनें: गायत्री मंत्र

मधुर संगीत के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में शांत पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।

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गायत्री मंत्र क्या है

गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62वें सूक्त का दसवाँ मंत्र है, जिसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं। यह सविता देव को संबोधित है, यानी सूर्य, जो सबको जीवन और गति देने वाली शक्ति हैं। इसका नाम इसके छंद से पड़ा: आठ-आठ अक्षरों की तीन पंक्तियाँ, गायत्री छंद। यह मंत्र इतना केंद्रीय है कि छंद का नाम ही मंत्र का नाम बन गया, और आगे चलकर एक देवी का भी, गायत्री माता, जो इस मंत्र का साकार रूप मानी जाती हैं।

मंत्र से पहले ॐ और तीन व्याहृतियाँ बोली जाती हैं, भूर्भुवः स्वः: पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग, यानी “सभी लोकों में”। प्रार्थना ख़ुद न धन माँगती है, न रक्षा। यह केवल इतना माँगती है कि ईश्वर का प्रकाश हमारी बुद्धि को जगाए और सही राह दिखाए; इसीलिए घरों में बच्चों को सबसे पहले यही सिखाया जाता है और विद्यार्थी पढ़ाई से पहले इसे बोलते हैं।

गायत्री मंत्र, अर्थ सहित

परंपरा से मंत्र लगातार तीन बार बोला जाता है; ऑडियो में यह एक बार धीरे-धीरे है, ताकि आप उसके बाद दोहरा सकें।

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गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

Om bhur bhuvah svah,
tat savitur varenyam bhargo devasya dhimahi,
dhiyo yo nah prachodayat.

अर्थ: ॐ। पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग, सभी लोकों में व्याप्त उस सविता देव के श्रेष्ठ, पूजनीय तेज का हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धि को प्रेरित करें, सही दिशा में जगाएँ।

Meaning: Om. Earth, sky and heaven. We meditate on that most excellent radiance of the divine Savitri, the Sun who brings all to life. May he awaken and guide our minds.

शब्द-दर-शब्द अर्थ

  • ॐ: वह पवित्र अक्षर जिससे हर वैदिक पाठ शुरू होता है।
  • भूः, भुवः, स्वः: पृथ्वी, धरती और आकाश के बीच का अंतरिक्ष, और स्वर्ग।
  • तत्: उस।
  • सवितुः: सविता का, यानी सूर्य का, जो सबको प्रेरणा और जीवन देते हैं।
  • वरेण्यम्: श्रेष्ठ, वरण करने योग्य, पूजनीय।
  • भर्गः: तेज, वह प्रकाश जो अज्ञान को जला देता है।
  • देवस्य: देव का, प्रकाशमान का।
  • धीमहि: हम ध्यान करते हैं, मन में धारण करते हैं।
  • धियः: बुद्धियाँ, विचार, समझ।
  • यः: जो।
  • नः: हमारी।
  • प्रचोदयात्: प्रेरित करें, आगे बढ़ाएँ, जगाएँ।

जप कैसे करें, क्रम से

कोई ख़ास सामग्री नहीं चाहिए। तीन बार बोलने में एक मिनट से कम लगता है; 108 की पूरी माला में लगभग पंद्रह मिनट।

  1. स्नान करें या हाथ-मुँह धो लें, और साफ़ आसन पर पूर्व की ओर (उगते सूर्य की ओर) मुँह करके बैठें।
  2. कमर सीधी रखकर बैठें और कुछ धीमी साँसें लें।
  3. मंत्र धीरे और साफ़ बोलें, ज़ोर से, धीमे या मन में। अर्थ ध्यान में रखें: आप एक साफ़, जागी हुई बुद्धि माँग रहे हैं।
  4. 3, 11 या 108 बार जप करें। 108 के लिए 108 मनकों की माला लें और हर बार एक मनका आगे बढ़ाएँ।
  5. अंत में एक पल शांत बैठें। चाहें तो सुबह ताँबे के लोटे से सूर्य को जल (अर्घ्य) चढ़ाएँ।

परंपरा से इसका जप दिन की तीन संधियों में होता है: सूर्योदय, दोपहर और सूर्यास्त। सबसे आम सूर्योदय है। कुछ परिवारों की अपनी रीतियाँ हैं कि कौन जप करे; आज यह घरों और विद्यालयों में खुले रूप से सिखाया जाता है, और जो भी चाहे, सम्मान के साथ इसका जप कर सकता है।

सवाल-जवाब

गायत्री मंत्र कितनी बार जपना चाहिए?

कम से कम तीन बार आम है, 11 या 21 भी, और 108 (एक माला) पारंपरिक पूरा जप है। जल्दी में बहुत बार से ध्यान से कुछ बार बेहतर है।

जप का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

सूर्योदय, पूर्व की ओर मुँह करके। दोपहर और सूर्यास्त बाक़ी दो पारंपरिक समय हैं। पढ़ाई या किसी ज़रूरी काम से पहले भी आम है।

गायत्री मंत्र किस देवता को संबोधित है?

सविता देव को, यानी जीवन देने वाली शक्ति के रूप में सूर्य को। बहुत से लोग इसे एक ही दिव्य प्रकाश की प्रार्थना मानते हैं, और बाद की परंपरा मंत्र को ही देवी गायत्री मानती है।

क्या “भूर्भुवः स्वः” ऋग्वेद के मंत्र का हिस्सा है?

नहीं। ऋग्वेद का मंत्र “तत्सवितुः” से शुरू होता है। ॐ और तीन व्याहृतियाँ रोज़ के जप में उसके पहले जोड़ी जाती हैं, जैसा यजुर्वेद और संध्या-विधि की पुस्तकों में है।

पाठ और स्रोत

पाठ: ऋग्वेद 3.62.10 (संस्कृत विकिस्रोत पर सायण भाष्य सहित ऋग्वेद से मिलाया गया) और वही मंत्र ॐ और व्याहृतियों सहित, जैसा शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता 36.3) और घरेलू संध्या-विधि में बोला जाता है। रोज़ के पाठ की तरह वैदिक स्वर-चिह्न नहीं दिए गए हैं। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ, शब्दार्थ और अनुवाद हमारे अपने हैं।

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