स्तोत्र · कृष्ण

गोपाल स्तोत्र: अर्थ सहित

एक छोटी स्तुति जो श्रीकृष्ण को गोपाल, वृंदावन के नन्हे ग्वाले के रूप में चित्रित करती है: मोरपंख, बाँसुरी, गायें, यमुना, और छाते की तरह उठाया गोवर्धन। उनके ध्यान के पंद्रह श्लोक, और पाठ का फल बताने वाले दो श्लोक।

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सुनें: गोपाल स्तोत्र

मधुर संगीत के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में शांत पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।

गोपाल स्तोत्र क्या है

गोपाल का अर्थ है “गायों का रक्षक”: वे श्रीकृष्ण जो गोकुल और वृंदावन के ग्वालों के बीच पले-बढ़े। इस रूप की कई संस्कृत स्तुतियाँ हैं; पुराने स्तोत्र-संग्रहों में केवल “गोपाल स्तोत्र” नाम से छपी स्तुति यही है, जिसे नारद मुनि कहते हैं। एक परंपरा इसे नारद पंचरात्र का भाग मानती है (जहाँ इसे गोपाल स्तवराज, यानी “गोपाल की स्तुतियों का राजा”, भी कहा गया है); पूजा-विधि का प्रसिद्ध बंगाली ग्रंथ बृहत् तंत्रसार यही स्तुति गौतमीय तंत्र से “गोपाल स्तोत्र” नाम से देता है।

यह एक ध्यान स्तुति है, यानी मन में भगवान का रूप देखने के लिए। श्लोक-दर-श्लोक यह एक दृश्य बनाती है: बादल जैसे साँवले कृष्ण, बालों में मोरपंख, होंठों पर बाँसुरी, चारों ओर गोपियाँ, कुश्ती लड़ते ग्वाल-बाल, बाँसुरी सुनकर सिर उठाती गायें, इंद्र की मूसलधार बारिश में बाएँ हाथ की हथेली पर उठा गोवर्धन, और अंत में स्तुति गाते नारद और मुनि। आख़िरी दो श्लोक, स्तोत्रों की परंपरा के अनुसार, पाठ का फल बताते हैं।

पाठ कैसे करें

एक जैसी गति से इसमें लगभग चार से पाँच मिनट लगते हैं।

  1. श्रीकृष्ण, बाल गोपाल या राधा-कृष्ण के चित्र के सामने बैठें; दीया जलाएँ और चाहें तो तुलसी पत्र, फूल या थोड़ा मक्खन-मिश्री चढ़ाएँ।
  2. स्तोत्र स्वयं दिन की तीन संध्याओं, यानी सुबह, दोपहर और शाम, की बात करता है। आम तौर पर लोग दिन में एक बार पढ़ते हैं; जन्माष्टमी, एकादशी और कार्तिक व सावन के महीने ख़ास माने जाते हैं।
  3. धीरे पढ़ें और आगे बढ़ने से पहले हर श्लोक को मन में एक चित्र बनने दें; इस स्तुति का यही उद्देश्य है।
  4. अंत में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” बोलें या श्रीकृष्ण की आरती गाएँ।

गोपाल स्तोत्र, अर्थ सहित

गोपाल के ध्यान के पंद्रह श्लोक, फिर पाठ का फल बताने वाले दो श्लोक (फलश्रुति)।

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श्लोक 1

श्रीनारद उवाच।
नवीननीरदश्यामं नीलेन्दीवरलोचनम्।
बल्लवीनन्दनं वन्दे कृष्णं गोपालरूपिणम्॥

Shri Narada uvacha.
Navina-nirada-shyamam nilendivara-lochanam,
ballavi-nandanam vande krishnam gopala-rupinam.

अर्थ: श्री नारद जी बोले: जो नए बरसाती बादल जैसे साँवले हैं, जिनकी आँखें नीले कमल जैसी हैं, जो ग्वालिनों के आनंद हैं (यशोदा जी के लाल), उन गोपाल रूप वाले श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ।

Meaning: Shri Narada said: Dark as a fresh rain cloud, with eyes like blue lotuses, the joy of the cowherd women (and son of one of them, Yashoda): I bow to Krishna in the form of Gopala, the cowherd.

श्लोक 2

स्फुरद्बर्हिदलोद्बद्धनीलकुञ्चितमूर्धजम्।
कदम्बकुसुमोद्बद्धवनमालाविभूषितम्॥

Sphurad-barhi-dalodbaddha-nila-kunchita-murdhajam,
kadamba-kusumodbaddha-vanamala-vibhushitam.

अर्थ: उनके काले, घुँघराले बालों में चमकते मोरपंख बँधे हैं, और वे कदंब के फूलों से गुँथी वनमाला से सजे हैं।

Meaning: His dark curly hair is tied with shimmering peacock feathers, and he wears a forest garland woven with kadamba flowers.

श्लोक 3

गण्डमण्डलसंसर्गिचलत्कुञ्चितकुन्तलम्।
स्थूलमुक्ताफलोदारहारद्योतितवक्षसम्॥

Ganda-mandala-samsargi-chalat-kunchita-kuntalam,
sthula-muktaphalodara-hara-dyotita-vakshasam.

अर्थ: उनकी घुँघराली लटें हिलती हुई उनके गोल गालों को छूती हैं, और उनकी छाती बड़े मोतियों के सुंदर हार से चमक रही है।

Meaning: His curly locks swing and brush against his round cheeks, and his chest gleams with a fine necklace of large pearls.

श्लोक 4

हेमाङ्गदतुलाकोटिकिरीटोज्ज्वलविग्रहम्।
मन्दमारुतसंक्षोभचलिताम्बरसञ्चयम्॥

Hemangada-tulakoti-kiritojjvala-vigraham,
manda-maruta-samkshobha-chalitambara-sanchayam.

अर्थ: सोने के बाजूबंद, पायल और मुकुट से उनका शरीर दमक रहा है, और धीमी हवा के झोंकों से उनके वस्त्रों की परतें लहरा रही हैं।

Meaning: His body glows with golden armlets, anklets and a crown, and the folds of his garment flutter in the gentle breeze.

श्लोक 5

रुचिरौष्ठपुटन्यस्तवंशीमधुरनिःस्वनैः।
लसद्गोपालिकाचेतो मोहयन्तं पुनः पुनः॥

Ruchiraushtha-puta-nyasta-vamshi-madhura-nihsvanaih,
lasad-gopalika-cheto mohayantam punah punah.

अर्थ: अपने सुंदर होंठों पर रखी बाँसुरी की मीठी धुन से वे सजी-धजी ग्वालिनों के मन को बार-बार मोह लेते हैं।

Meaning: With the sweet notes of the flute set on his lovely lips, he charms the hearts of the bright-faced cowherd girls again and again.

श्लोक 6

बल्लवीवदनाम्भोजमधुपानमधुव्रतम्।
क्षोभयन्तं मनस्तासां सस्मेरापाङ्गवीक्षणैः॥

Ballavi-vadanambhoja-madhu-pana-madhuvratam,
kshobhayantam manas tasam sasmerapanga-vikshanaih.

अर्थ: ग्वालिनों के कमल जैसे चेहरों का रस पीने वाले भौंरे जैसे वे, मुस्कुराती तिरछी नज़रों से उनके मन में हलचल मचा देते हैं।

Meaning: Like a bee drinking honey from the lotus faces of the cowherd women, he stirs their hearts with smiling sidelong glances.

श्लोक 7

यौवनोद्भिन्नदेहाभिः संसक्ताभिः परस्परम्।
विचित्राम्बरभूषाभिर्गोपनारीभिरावृतम्॥

Yauvanodbhinna-dehabhih samsaktabhih parasparam,
vichitrambara-bhushabhir gopa-naribhir avritam.

अर्थ: वे यौवन से खिली, एक-दूसरे का हाथ थामे, रंग-बिरंगे वस्त्रों और गहनों से सजी गोप-स्त्रियों से घिरे हैं।

Meaning: He is surrounded by cowherd women in the bloom of youth, holding on to one another, dressed in bright clothes and ornaments.

श्लोक 8

प्रभिन्नाञ्जनकालिन्दीजलकेलिकलोत्सुकम्।
योधयन्तं क्वचिद्गोपान् व्याहरन्तं गवां गणम्॥

Prabhinnanjana-kalindi-jala-keli-kalotsukam,
yodhayantam kvachid gopan vyaharantam gavam ganam.

अर्थ: वे पिसे हुए काजल जैसे गहरे रंग वाली यमुना (कालिंदी) के जल में खेलने को उत्सुक हैं; कभी ग्वाल-बालों को आपस में कुश्ती लड़ाते हैं, कभी गायों के झुंड को पुकारते हैं।

Meaning: He is eager for games in the waters of the Yamuna (Kalindi), dark as ground kohl; sometimes he sets the cowherd boys wrestling, sometimes he calls out to the herd of cows.

श्लोक 9

कालिन्दीजलसंसर्गिशीतलानिलसेविते।
कदम्बपादपच्छाये स्थितं वृन्दावने क्वचित्॥

Kalindi-jala-samsargi-shitalanila-sevite,
kadamba-padapa-chchhaye sthitam vrindavane kvachit.

अर्थ: कभी वे वृंदावन में कदंब के पेड़ की छाया में खड़े हैं, जहाँ यमुना के जल को छूकर आती ठंडी हवा बहती है।

Meaning: Sometimes he stands in Vrindavan in the shade of a kadamba tree, where a cool breeze blows that has touched the Yamuna's water.

श्लोक 10

रत्नभूधरसंलग्नरत्नासनपरिग्रहम्।
कल्पपादपमध्यस्थहेममण्डपिकागतम्॥

Ratna-bhudhara-samlagna-ratnasana-parigraham,
kalpa-padapa-madhyastha-hema-mandapikagatam.

अर्थ: कभी वे रत्नों के पर्वत पर रखे रत्न-जड़ित आसन पर बैठे हैं, कल्पवृक्षों के बीच बने सोने के छोटे मंडप में।

Meaning: Or he is seated on a jewelled throne set on a mountain of gems, in a small golden pavilion among wish-fulfilling trees.

श्लोक 11

वसन्तकुसुमामोदसुरभीकृतदिङ्मुखे।
गोवर्धनगिरौ रम्ये स्थितं रासरसोत्सुकम्॥

Vasanta-kusumamoda-surabhikrita-dinmukhe,
govardhana-girau ramye sthitam rasa-rasotsukam.

अर्थ: सुंदर गोवर्धन पर्वत पर, जहाँ वसंत के फूलों की सुगंध से सारी दिशाएँ महक रही हैं, वे रास के आनंद के लिए उत्सुक खड़े हैं।

Meaning: On lovely Govardhan hill, where the scent of spring flowers fills every direction, he stands eager for the joy of the rasa dance.

श्लोक 12

सव्यहस्ततलन्यस्तगिरिवर्यातपत्रकम्।
खण्डिताखण्डलोन्मुक्तमुक्तासारघनाघनम्॥

Savya-hasta-tala-nyasta-girivaryatapatrakam,
khanditakhandalonmukta-muktasara-ghanaghanam.

अर्थ: उन्होंने बाएँ हाथ की हथेली पर महान गोवर्धन पर्वत को छाते की तरह उठा रखा है, जबकि जिन इंद्र का घमंड उन्होंने तोड़ा, उनके छोड़े घने बादल मोतियों की लड़ियों जैसी मूसलधार बारिश बरसा रहे हैं।

Meaning: On the palm of his left hand he holds up the great hill like an umbrella, while the heavy clouds let loose by Indra, whose pride he has broken, pour down rain like strings of pearls.

श्लोक 13

वेणुवाद्यमहोल्लासकृतहुङ्कारनिःस्वनैः।
सवत्सैरुन्मुखैः शश्वद्गोकुलैरभिवीक्षितम्॥

Venu-vadya-mahollasa-krita-hunkara-nihsvanaih,
savatsair unmukhaih shashvad gokulair abhivikshitam.

अर्थ: बाँसुरी की धुन से आनंद में भरकर रँभाती गायों के झुंड, अपने बछड़ों के साथ सिर उठाए, उन्हें लगातार निहार रहे हैं।

Meaning: The herds of cows with their calves, lowing in delight at the music of his flute, raise their heads and gaze at him without end.

श्लोक 14

कृष्णमेवानुगायद्भिस्तच्चेष्टावशवर्तिभिः।
दण्डपाशोद्यतकरैर्गोपालैरुपशोभितम्॥

Krishnam evanugayadbhis tach-cheshta-vasha-vartibhih,
danda-pashodyata-karair gopalair upashobhitam.

अर्थ: उनके चारों ओर ग्वाल-बाल शोभा बढ़ा रहे हैं, जो केवल कृष्ण के ही गीत गाते हैं, उनकी हर चाल के पीछे चलते हैं, और हाथों में लाठी और रस्सी उठाए हुए हैं।

Meaning: He is graced by cowherd boys who sing of no one but Krishna, follow his every move, and hold up their sticks and ropes.

श्लोक 15

नारदाद्यैर्मुनिश्रेष्ठैर्वेदवेदाङ्गपारगैः।
प्रीतिसुस्निग्धया वाचा स्तूयमानं परात्परम्॥

Naradadyair muni-shreshthair veda-vedanga-paragaih,
priti-susnigdhaya vacha stuyamanam paratparam.

अर्थ: नारद आदि श्रेष्ठ मुनि, जो वेदों और वेदांगों के पारंगत हैं, प्रेम से भीगी वाणी में उन ऊँचे से भी ऊँचे प्रभु की स्तुति कर रहे हैं।

Meaning: Narada and the greatest sages, masters of the Vedas and their branches, praise him, higher than the highest, in words soft with love.

श्लोक 16

य एवं चिन्तयेद्देवं भक्त्या संस्तौति मानवः।
त्रिसन्ध्यं तस्य तुष्टोऽसौ ददाति वरमीप्सितम्॥

Ya evam chintayed devam bhaktya samstauti manavah,
tri-sandhyam tasya tushto 'sau dadati varam ipsitam.

अर्थ: (फलश्रुति) जो व्यक्ति सुबह, दोपहर और शाम, तीनों संध्याओं में भगवान का इस तरह ध्यान करता है और भक्ति से उनकी स्तुति करता है, उससे प्रसन्न होकर भगवान मनचाहा वरदान देते हैं, ऐसा यह श्लोक कहता है।

Meaning: (The fruit of reciting) Whoever pictures the Lord in this way and praises him with devotion at the three junctions of the day (dawn, noon and dusk), the verse says, pleases him, and he grants the boon that person longs for.

श्लोक 17

राजवल्लभतामेति भवेत्सर्वजनप्रियः।
अचलां श्रियमाप्नोति स वाग्मी जायते ध्रुवम्॥

Raja-vallabhatam eti bhavet sarva-jana-priyah,
achalam shriyam apnoti sa vagmi jayate dhruvam.

अर्थ: (फलश्रुति) ऐसा व्यक्ति शासकों का प्रिय बनता है, सब लोगों को प्यारा होता है, स्थिर समृद्धि पाता है और निश्चय ही अच्छा वक्ता बनता है, ऐसा परंपरा से माना जाता है।

Meaning: (The fruit of reciting) Such a person, it is traditionally said, wins the favour of rulers, becomes dear to everyone, gains lasting prosperity and surely becomes a gifted speaker.

सवाल-जवाब

यह कौन-सा गोपाल स्तोत्र है?

गोपाल की कई स्तुतियाँ हैं। यह नारद जी की कही सत्रह श्लोकों वाली स्तुति है जो “नवीननीरदश्यामं” से शुरू होती है, और संस्कृत विकिस्रोत, sanskritdocuments.org और बृहत् तंत्रसार में “गोपाल स्तोत्र” नाम से छपी है। मिलते-जुलते नाम वाली दूसरी स्तुतियाँ, जैसे गोपालाष्टक, संतान गोपाल स्तोत्र या गोपाल सहस्रनाम, अलग ग्रंथ हैं।

इसकी रचना किसने की?

यह स्तुति नारद मुनि के मुख से कही गई है। प्रतियों की एक परंपरा इसका स्रोत नारद पंचरात्र बताती है, और बृहत् तंत्रसार गौतमीय तंत्र। ज़्यादातर स्तोत्रों की तरह इसका समय ठीक-ठीक तय नहीं किया जा सकता; यह एक पुराना, सार्वजनिक पाठ है।

क्या इस स्तुति से कुछ माँगना ठीक है?

अंतिम श्लोक कृपा, लोगों के स्नेह, समृद्धि और वाणी की कुशलता की बात करते हैं, जैसा बहुत से स्तोत्रों में होता है; ये पारंपरिक मान्यताएँ हैं, वादे नहीं। ज़्यादातर लोग इसे बस कुछ शांत मिनट श्रीकृष्ण के ध्यान में बिताने के लिए पढ़ते हैं, और यही इस स्तुति का सार है।

पाठ और स्रोत

संस्कृत पाठ सार्वजनिक है। हमने हर श्लोक पाठ की दो स्वतंत्र परंपराओं से मिलाया है: sanskritdocuments.org का पाठ (“गोपालस्तोत्रं अथवा गोपालस्तवराजस्तोत्रम्”, नारद पंचरात्र, ज्ञानामृतसार, चतुर्थ रात्र से), जिसे संस्कृत विकिस्रोत का “गोपालस्तोत्रम्” पृष्ठ शब्दशः दोहराता है, और संस्कृत विकिस्रोत पर उपलब्ध बृहत् तंत्रसार (परिच्छेद 4) का “गोपालस्तोत्र”, जो इसे गौतमीय तंत्र का बताता है। जहाँ दोनों पाठ ठीक हैं, वहाँ हमने पहला पाठ लिया है, और जहाँ छंद या व्याकरण के लिए ज़रूरी था, वहाँ तंत्रसार का: “स्थूलमुक्ताफलोदारहारद्योतित” (श्लोक 3, “स्थूलं मुक्ताफलोदारहारोद्योतित” की जगह), “यौवनोद्भिन्न” (श्लोक 7, “यौवनोद्भि” की जगह) और “गोपालैरुपशोभितम्” (श्लोक 14)। तंत्रसार के जो पाठांतर नहीं लिए: “चलत्काञ्चनकुण्डलम्”, यानी हिलते सोने के कुंडल (श्लोक 3), “वल्गिताम्बर” (श्लोक 4) और “मुहुर्मुहुः” (श्लोक 5); उसके बाक़ी अंतर ब/व की वर्तनी और टंकण भूलें हैं। sanskritdocuments स्तुति से पहले जो ध्यान श्लोक “सजलजलदनीलं” देता है, वह केवल उसी स्रोत में है, इसलिए हमने उसे नहीं रखा। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ और अर्थ हमारे अपने हैं।

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