आरती · सूर्य

जय कश्यप नन्दन: सूर्य देव की आरती अर्थ सहित

सूर्य देव की आरती, जो ऋषि कश्यप और माता अदिति के पुत्र हैं: प्रकाश, स्वास्थ्य और साफ़ समझ के बारे में सात छोटे पद, हिंदी में, अंग्रेज़ी अक्षरों में और सरल अर्थ के साथ।

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सुनें: सूर्य देव की आरती: जय कश्यप नन्दन

ताली, घंटी और मंजीरे की हल्की आरती-ताल के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।

यह आरती क्या है

सूर्य को देवता के रूप में पूजा जाता है: प्रकाश, गर्मी और समय का प्रत्यक्ष स्रोत। पुराणों में वे ऋषि कश्यप और माता अदिति के पुत्र हैं, इसीलिए यह आरती “जय कश्यप-नन्दन… जय अदिति-नन्दन” से शुरू होती है। वे सात घोड़ों वाले, एक पहिये के रथ पर चलते हैं।

यह अज्ञात रचयिता की पारंपरिक आरती है, जो गीता प्रेस के “आरती संग्रह” में छपी है। इसके पदों में सूर्य के पुराने नाम भरे हैं (दिवाकर, सविता, विश्व-विलोचन), और अंत में अज्ञान की जगह सच्चे ज्ञान की माँग है। एक बार पूरी गाने में लगभग चार मिनट लगते हैं।

कब गाई जाती है

  • रविवार, सूर्य का दिन, अक्सर उगते सूर्य को जल (अर्घ्य) देने के बाद।
  • छठ पूजा, मकर संक्रांति और रथ सप्तमी, सूर्य के बड़े पर्व।
  • रोज़ सुबह, उन घरों में जहाँ दिन सूर्य पूजा से शुरू होता है।

आरती कैसे करें, क्रम से

पंडित जी की ज़रूरत नहीं। आरती हर पूजा का अंतिम भाग है, और इसे अकेले भी, सुबह या शाम, लगभग पाँच मिनट में किया जा सकता है।

  1. हाथ-मुँह धोकर सूर्य देव, या सीधे उगते सूर्य के चित्र या मूर्ति के सामने खड़े हों या बैठें।
  2. एक थाली में घी का दीया या कपूर, थोड़ी रोली और चावल, एक फूल और लाल फूल, थोड़ा गुड़ या गेहूँ की मिठाई रखें।
  3. दीया या कपूर जलाएँ। कोई घंटी बजाए, या सब ताली बजाते हुए साथ गाएँ।
  4. नीचे दी आरती गाएँ और थाली को धीरे-धीरे दाईं ओर (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएँ। घरों में चलन है: चार बार चरणों की ओर, दो बार नाभि की ओर, एक बार मुख की ओर, फिर सात बार पूरे रूप के चारों ओर।
  5. आख़िरी पद के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर उसे रख दें।
  6. सब आरती लें: दोनों हथेलियाँ एक पल लौ के ऊपर रखकर आँखों और सिर से लगाएँ। फिर प्रसाद बाँटें।

धुन और कुछ शब्द हर घर में थोड़े अलग होते हैं। जैसे आपके घर में गाई जाती है, वैसे ही गाइए; भाव शब्दों से ज़्यादा मायने रखता है।

जय कश्यप नन्दन, अर्थ सहित

पहला पद टेक है: यह शुरू में गाया जाता है और हर पद के बाद दोहराया जाता है।

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टेक

जय कश्यप नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकन्दन, भक्त हृदय चन्दन॥

Jai Kashyap nandan, Om jai Aditi nandan,
tribhuvan timir nikandan, bhakt hriday chandan.

अर्थ: जय हो कश्यप ऋषि के पुत्र, जय हो अदिति माता के पुत्र! आप तीनों लोकों का अंधकार मिटाते हैं, और भक्तों के हृदय को चंदन जैसी शीतलता देते हैं।

Meaning: Glory to the son of Kashyapa, glory to the son of Aditi! You destroy the darkness of the three worlds, and are cool sandalwood to your devotees' hearts.

पद 1

सप्त अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दुःखहारी, सुखकारी, मानस मलहारी॥

Sapt ashvarath rajit, ek chakradhari,
dukhhari, sukhkari, manas malhari.

अर्थ: आप सात घोड़ों वाले रथ पर विराजते हैं, जिसका एक ही पहिया है। आप दुख हरते हैं, सुख देते हैं और मन का मैल धो देते हैं।

Meaning: You shine on a chariot of seven horses that runs on a single wheel. You take away sorrow, bring happiness and wash the mind clean.

पद 2

सुर मुनि भूसुर वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ दल दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥

Sur muni bhoosur vandit, vimal vibhavshali,
agh dal dalan Divakar, divya kiran mali.

अर्थ: देवता, मुनि और ब्राह्मण आपको प्रणाम करते हैं; आप निर्मल और महान वैभव वाले हैं। हे दिवाकर (दिन बनाने वाले), आप पापों के ढेर को कुचलते हैं और दिव्य किरणों की माला पहनते हैं।

Meaning: Gods, sages and the learned bow to you; you are pure and full of glory. Divakar, maker of the day, you crush heaps of wrongdoing and wear a garland of divine rays.

पद 3

सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व विलोचन मोचन, भव बन्धन भारी॥

Sakal sukarm prasavita, Savita shubhkari,
vishva vilochan mochan, bhav bandhan bhari.

अर्थ: हे सविता, आप सब अच्छे कर्मों को जन्म देने वाले और शुभ करने वाले हैं। आप संसार की आँख हैं, और संसार के भारी बंधन से छुड़ाने वाले हैं।

Meaning: Savita, you bring every good deed to birth and do only good. You are the eye of the world, and you free us from the heavy bonds of worldly life.

पद 4

कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥

Kamal samooh vikasak, nashak tray tapa,
sevat sahaj harat ati, manasij santapa.

अर्थ: आप कमलों के समूह को खिलाते हैं और तीनों तरह के दुख (शरीर-मन के, दूसरों से मिले, और प्रकृति से आए) मिटाते हैं। आपकी सेवा करने से कामना की भारी जलन सहज ही दूर हो जाती है।

Meaning: You open whole ponds of lotuses and end the three kinds of suffering (of body and mind, from others, and from nature). Simply serving you eases the strong burning of desire.

पद 5

नेत्र व्याधि हर सुरवर, भू पीड़ा हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥

Netra vyadhi har survar, bhoo peeda haari,
vrishti vimochan santat, parhit vratdhari.

अर्थ: हे श्रेष्ठ देव, आप आँखों के रोग और धरती की पीड़ा हरने वाले माने जाते हैं। आप सदा वर्षा कराते हैं और दूसरों की भलाई का व्रत निभाते हैं।

Meaning: Best of gods, you are held to cure ailments of the eyes and to ease the pains of the earth. You keep the rains coming, true to your vow of doing good to others.

पद 6

सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान मोह सब, तत्त्वज्ञान दीजै॥

Suryadev karunakar, ab karuna keejai,
har agyan moh sab, tattvagyan deejai.

अर्थ: हे करुणा के भंडार सूर्य देव, अब हम पर करुणा कीजिए। सारा अज्ञान और मोह हर लीजिए, और सच्चा ज्ञान दीजिए।

Meaning: Surya Dev, treasury of compassion, show us your compassion now. Take away all ignorance and delusion, and give us knowledge of the truth.

सवाल-जवाब

सूर्य देव की आरती किसने लिखी?

रचयिता ज्ञात नहीं हैं। यह पारंपरिक आरती है, जो गीता प्रेस के “आरती संग्रह” में छपी है और उत्तर भारत के घरों और मंदिरों में गाई जाती है; सबके लिए है।

क्या सूर्य देव की आरती “ॐ जय सूर्य भगवान” नहीं है?

वह सूर्य देव की दूसरी प्रसिद्ध आरती है (“ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान”)। हमने “जय कश्यप नन्दन” दी है क्योंकि यही गीता प्रेस के संग्रह, द्रिक पंचांग और भक्ति भारत में छपी है, इसलिए इसका पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया जा सका। आपके घर में जो गाई जाती है, वही गाइए।

इसे गाने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

सूर्योदय के समय, सूर्य को जल (अर्घ्य) देने के बाद, ख़ासकर रविवार, छठ और मकर संक्रांति पर।

पाठ और स्रोत

पाठ अज्ञात रचयिता की पारंपरिक आरती है, सार्वजनिक। हर पंक्ति गीता प्रेस के “श्री आरती संग्रह” (भगवान सूर्य के अंतर्गत), द्रिक पंचांग और भक्ति भारत से मिलाई गई। हमने गीता प्रेस का पाठ लिया है, जिसकी टेक द्रिक पंचांग में भी वैसी ही है: “जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन”। बहुत से लोग इसे “ॐ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन” गाते हैं (भक्ति भारत)। बाक़ी अंतर केवल वर्तनी के हैं (“दुख”/“दुःख”, “बंधन”/“बन्धन”)। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ और अर्थ हमारे अपने हैं।

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