आरती · सरस्वती

जय सरस्वती माता: सरस्वती जी की आरती अर्थ सहित

विद्या, संगीत और वाणी की देवी सरस्वती की आरती, जो वसंत पंचमी पर और विद्यार्थियों द्वारा पढ़ाई व परीक्षा से पहले गाई जाती है। सात छोटे पद, हिंदी में, अंग्रेज़ी अक्षरों में और सरल अर्थ के साथ।

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सुनें: सरस्वती जी की आरती: जय सरस्वती माता

ताली, घंटी और मंजीरे की हल्की आरती-ताल के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।

यह आरती क्या है

सरस्वती ज्ञान, संगीत, कला और वाणी की देवी हैं। उन्हें श्वेत वस्त्रों में, कमल पर बैठे, वीणा, माला और पुस्तक लिए, हंस की सवारी के साथ दिखाया जाता है। “जय सरस्वती माता” उनकी सबसे प्रसिद्ध हिंदी आरती है, जो “ॐ जय जगदीश हरे” जैसी आसान धुन में गाई जाती है।

ज़्यादातर घरेलू आरतियों की तरह यह एक पारंपरिक लोक रचना है और इसके रचयिता ज्ञात नहीं हैं। इसमें देवी के रूप का वर्णन है, रामायण परंपरा की एक कथा की याद है, और एक ही माँग है: अज्ञान की जगह ज्ञान का प्रकाश। एक बार पूरी गाने में लगभग चार मिनट लगते हैं।

कब गाई जाती है

  • वसंत पंचमी: वसंत की शुरुआत में सरस्वती जी का पर्व, घरों, स्कूलों और कॉलेजों में।
  • नवरात्रि की सरस्वती पूजा (कई जगह सातवें से नौवें दिन) और विजयादशमी पर।
  • पढ़ाई, संगीत अभ्यास या परीक्षा से पहले, और बच्चे की पढ़ाई की शुरुआत (विद्यारंभ) पर।

आरती कैसे करें, क्रम से

पंडित जी की ज़रूरत नहीं। आरती हर पूजा का अंतिम भाग है, और इसे अकेले भी, सुबह या शाम, लगभग पाँच मिनट में किया जा सकता है।

  1. हाथ-मुँह धोकर सरस्वती माँ के चित्र या मूर्ति के सामने खड़े हों या बैठें।
  2. एक थाली में घी का दीया या कपूर, थोड़ी रोली और चावल, एक फूल और सफ़ेद फूल, कोई पुस्तक या क़लम, और मिठाई रखें।
  3. दीया या कपूर जलाएँ। कोई घंटी बजाए, या सब ताली बजाते हुए साथ गाएँ।
  4. नीचे दी आरती गाएँ और थाली को धीरे-धीरे दाईं ओर (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएँ। घरों में चलन है: चार बार चरणों की ओर, दो बार नाभि की ओर, एक बार मुख की ओर, फिर सात बार पूरे रूप के चारों ओर।
  5. आख़िरी पद के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर उसे रख दें।
  6. सब आरती लें: दोनों हथेलियाँ एक पल लौ के ऊपर रखकर आँखों और सिर से लगाएँ। फिर प्रसाद बाँटें।

धुन और कुछ शब्द हर घर में थोड़े अलग होते हैं। जैसे आपके घर में गाई जाती है, वैसे ही गाइए; भाव शब्दों से ज़्यादा मायने रखता है।

जय सरस्वती माता, अर्थ सहित

पहला पद टेक है: यह शुरू में गाया जाता है और हर पद के बाद, अक्सर “जय जय सरस्वती माता” कहकर, दोहराया जाता है।

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टेक

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

Jai Saraswati Mata, maiya jai Saraswati Mata,
sadgun vaibhav shalini, tribhuvan vikhyata.

अर्थ: जय हो सरस्वती माता, जय हो माँ! आप अच्छे गुणों के वैभव से भरी हैं और तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।

Meaning: Glory to you, Mother Saraswati! You are rich in every good quality, and famed throughout the three worlds.

पद 1

चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥

Chandravadani padmasini, dyuti mangalkari,
sohe shubh hans savari, atul tejdhari.

अर्थ: आपका मुख चंद्रमा जैसा है, आप कमल पर विराजती हैं, और आपकी आभा मंगल करने वाली है। शुभ हंस की सवारी आप पर सजती है; आपका तेज अतुलनीय है।

Meaning: Your face is like the moon, you sit on a lotus, and your radiance brings blessing. The graceful swan you ride suits you well; your brilliance has no equal.

पद 2

बाएँ कर में वीणा, दाएँ कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥

Baayen kar mein veena, daayen kar mala,
sheesh mukut mani sohe, gal motiyan mala.

अर्थ: आपके बाएँ हाथ में वीणा और दाएँ हाथ में माला है। सिर पर रत्नों वाला मुकुट शोभा देता है और गले में मोतियों की माला है।

Meaning: A veena in your left hand, a mala in your right; a jewelled crown shines on your head, and a string of pearls at your throat.

पद 3

देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥

Devi sharan jo aaye, unka uddhar kiya,
paithi Manthara dasi, Ravan sanhar kiya.

अर्थ: हे देवी, जो आपकी शरण में आए, उनका आपने उद्धार किया। आप दासी मंथरा के मन में जा बैठीं, और (इसी से हुई घटनाओं से) रावण का अंत हुआ।

Meaning: Goddess, you lifted up all who came to you for shelter. You entered the mind of the maid Manthara, and that set in motion the events that ended Ravana.

पद 4

विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥

Vidya gyan pradayini, gyan prakash bharo,
moh agyan aur timir ka, jag se naash karo.

अर्थ: हे विद्या और ज्ञान देने वाली, (हमारे भीतर) ज्ञान का प्रकाश भर दो। मोह, अज्ञान और अंधकार को संसार से मिटा दो।

Meaning: Giver of learning and knowledge, fill us with the light of understanding. Clear delusion, ignorance and darkness from the world.

पद 5

धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥

Dhoop deep phal meva, maa sweekar karo,
gyanchakshu de mata, jag nistar karo.

अर्थ: हे माँ, धूप, दीप, फल और मेवे की यह भेंट स्वीकार करो। ज्ञान की आँख देकर संसार को पार लगाओ।

Meaning: Mother, accept this incense, lamp, fruit and dry fruit. Give us the eye of wisdom and carry the world across.

पद 6

माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥

Maa Saraswati ki aarti, jo koi jan gaave,
hitkari sukhkari, gyan bhakti paave.

अर्थ: जो कोई माँ सरस्वती की यह आरती गाता है, उसे भलाई और सुख देने वाला ज्ञान और भक्ति मिलती है, ऐसा माना जाता है।

Meaning: Whoever sings this aarti of Mother Saraswati is said to gain knowledge and devotion, which bring good and happiness.

सवाल-जवाब

सरस्वती जी की आरती किसने लिखी?

कोई नहीं जानता। ज़्यादातर घरेलू हिंदी आरतियों की तरह यह एक पारंपरिक लोक रचना है, जो गाकर और छपी आरती पुस्तकों से आगे बढ़ी, और सबके लिए है।

मंथरा वाली पंक्ति का क्या अर्थ है?

रामचरितमानस में आई कथा: देवताओं ने सरस्वती जी से रानी कैकेयी की दासी मंथरा की बुद्धि फेरने को कहा। मंथरा ने कैकेयी को राम जी को वन भेजने के लिए मनाया, और आगे चलकर इसी से रावण का अंत हुआ। गीता प्रेस इस पंक्ति को “असुर-संहार किया” छापती है।

इसे गाने का सबसे अच्छा दिन कौन-सा है?

वसंत पंचमी सरस्वती जी का अपना पर्व है। उसके अलावा पढ़ाई, संगीत या रचनात्मक काम से पहले कोई भी दिन; कई परिवार गुरुवार को, या जब भी बच्चा पढ़ने बैठे, यह आरती गाते हैं।

पाठ और स्रोत

पाठ अज्ञात रचयिता की पारंपरिक आरती है, सार्वजनिक। हर पंक्ति द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और गीता प्रेस के “श्री आरती संग्रह” से मिलाई गई। हमने वह पाठ लिया है जो द्रिक पंचांग और भक्ति भारत में एक जैसा है और जो सबसे ज़्यादा गाया जाता है। गीता प्रेस में कई पंक्तियाँ अलग हैं: “सोहे हंस-सवारी” (“शुभ” के बिना), “दूजे कर माला”, पद 3 में “देव शरण में आये… असुर-संहार किया”, पद 4 में “वेद-ज्ञान-प्रदायिनि, बुद्धि-प्रकाश करो… सत्वर नाश करो”, और पद 5 में “पूजा स्वीकार करो… सब गुण-ज्ञान भरो”। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ और अर्थ हमारे अपने हैं।

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