आरती · सत्यनारायण
जय लक्ष्मी रमणा: श्री सत्यनारायण जी की आरती अर्थ सहित
वह आरती जिससे पूर्णिमा, गृह प्रवेश और पारिवारिक अवसरों पर सत्यनारायण कथा पूरी होती है। इसके पद कथा को संक्षेप में दोहराते हैं। यहाँ हिंदी में, अंग्रेज़ी अक्षरों में और सरल अर्थ के साथ।
सुनें: सत्यनारायण जी की आरती: जय लक्ष्मी रमणा
ताली, घंटी और मंजीरे की हल्की आरती-ताल के साथ कंप्यूटर-आवाज़ में पाठ, जो पंक्ति-दर-पंक्ति मूल पाठ से जाँचा गया है। यह साथ पढ़ने में सहायता है, पंडित जी या घर के बड़ों का विकल्प नहीं।
यह आरती क्या है
सत्यनारायण भगवान विष्णु का वह रूप हैं जिन्हें स्वयं सत्य मानकर पूजा जाता है। उनकी पूजा और कथा, जो स्कंद पुराण की परंपरा से कही जाने वाली छोटी कहानियों का संग्रह है, उत्तर भारत की सबसे आम पारिवारिक पूजाओं में से है: पूर्णिमा पर, गृह प्रवेश पर, विवाह के बाद या किसी भी ख़ुशी के मौक़े पर। “जय लक्ष्मी रमणा” (लक्ष्मी जी के प्रिय की जय) वह आरती है जिससे यह पूजा पूरी होती है।
यह अज्ञात रचयिता की पारंपरिक आरती है। इसके बीच के पद कथा को संक्षेप में दोहराते हैं: बूढ़ा ब्राह्मण, ग़रीब लकड़हारा, अपना वचन भूलने वाला व्यापारी, ग्वालों का प्रसाद ठुकराने वाला राजा। अंत में पूजा की सामग्री आती है: सवाया प्रसाद, केले और तुलसी। एक बार पूरी गाने में लगभग पाँच मिनट लगते हैं।
कब गाई जाती है
- सत्यनारायण कथा के अंत में, पाँचवें अध्याय के बाद और प्रसाद बँटने से पहले।
- पूर्णिमा, कथा का सामान्य दिन, और कुछ घरों में एकादशी पर।
- गृह प्रवेश, विवाह, जन्मदिन, नई नौकरी या परिवार का कोई भी शुभ अवसर।
आरती कैसे करें, क्रम से
पंडित जी की ज़रूरत नहीं। आरती हर पूजा का अंतिम भाग है, और इसे अकेले भी, सुबह या शाम, लगभग पाँच मिनट में किया जा सकता है।
- हाथ-मुँह धोकर सत्यनारायण भगवान (विष्णु) के चित्र या मूर्ति के सामने खड़े हों या बैठें।
- एक थाली में घी का दीया या कपूर, थोड़ी रोली और चावल, एक फूल और तुलसी के पत्ते, केले और पंजीरी या हलवे का प्रसाद रखें।
- दीया या कपूर जलाएँ। कोई घंटी बजाए, या सब ताली बजाते हुए साथ गाएँ।
- नीचे दी आरती गाएँ और थाली को धीरे-धीरे दाईं ओर (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएँ। घरों में चलन है: चार बार चरणों की ओर, दो बार नाभि की ओर, एक बार मुख की ओर, फिर सात बार पूरे रूप के चारों ओर।
- आख़िरी पद के बाद थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर उसे रख दें।
- सब आरती लें: दोनों हथेलियाँ एक पल लौ के ऊपर रखकर आँखों और सिर से लगाएँ। फिर प्रसाद बाँटें।
धुन और कुछ शब्द हर घर में थोड़े अलग होते हैं। जैसे आपके घर में गाई जाती है, वैसे ही गाइए; भाव शब्दों से ज़्यादा मायने रखता है।
जय लक्ष्मी रमणा, अर्थ सहित
पहला पद टेक है: यह शुरू में गाया जाता है, और इसकी पहली पंक्ति हर पद के बाद दोहराई जाती है।
सवाल-जवाब
सत्यनारायण जी की आरती किसने लिखी?
रचयिता ज्ञात नहीं हैं। कुछ पाठ “शिवानन्द” नाम वाले पद से ख़त्म होते हैं (ऐसी छाप दूसरी आरतियों में भी मिलती है), पर जिन पुराने छपे पाठों से हमने मिलाया उनमें यह नहीं है। यह पारंपरिक आरती है, सबके लिए।
क्या यह ॐ जय जगदीश हरे जैसी ही है?
नहीं, पर इसकी धुन लगभग वही है, और दोनों विष्णु जी को संबोधित हैं। बहुत से परिवार कथा के ठीक बाद “जय लक्ष्मी रमणा” और फिर “ॐ जय जगदीश हरे” गाते हैं।
बीच के पद किस बारे में हैं?
सत्यनारायण कथा की कहानियों की ओर: एक ग़रीब ब्राह्मण और एक लकड़हारा जिनका व्रत के बाद भला होता है, एक व्यापारी जो वचन भूलकर कष्ट पाता है जब तक वचन पूरा न करे, और एक राजा जो ग्वालों के प्रसाद का अनादर करता है और बाद में उनके साथ पूजा करता है। आरती हर कथा को एक-दो पंक्तियों में कहती है।
पाठ और स्रोत
पाठ अज्ञात रचयिता की पारंपरिक आरती है, सार्वजनिक। हर पंक्ति गीता प्रेस के “श्री आरती संग्रह”, खेमराज श्रीकृष्णदास (बम्बई) के पुराने “आरती संग्रह”, भक्ति भारत और द्रिक पंचांग से मिलाई गई। हमने गीता प्रेस का पाठ लिया है, और टेक में “ॐ … स्वामी जय लक्ष्मी रमणा”, जैसा आम तौर पर गाया जाता है (गीता प्रेस और द्रिक पंचांग: “जय लक्ष्मी रमणा, श्री लक्ष्मी रमणा”)। पाठांतर: “बूढ़ो”/“बूढ़ा ब्राह्मण”, “दरस” की जगह “दर्श”, पद 3 में “इन पर” और “तिनकी विपत्ति हरी”, “दीन्हों”/“दीनो”, और “सवायो” की जगह “सवाया”। अंतिम पद में सबसे ज़्यादा अंतर है: भक्ति भारत में “ऋद्धि-सिद्धि सुख-संपत्ति सहज रूप पावे” है, और द्रिक पंचांग शिवानन्द के नाम वाले पद से समाप्त करता है। अंग्रेज़ी अक्षरों का पाठ और अर्थ हमारे अपने हैं।
भक्ति संग्रह में और
ॐ जय जगदीश हरे
लगभग हर घर में गाई जाने वाली विष्णु जी की आरती, हर पद के अर्थ के साथ।
लक्ष्मी जी की आरती: ॐ जय लक्ष्मी माता
ॐ जय लक्ष्मी माता, हर पद के अर्थ के साथ, और घर पर आरती करने की विधि।
गणेश जी की आरती: जय गणेश देवा
जय गणेश देवा, हर पद के अर्थ के साथ, और घर पर आरती करने की विधि।
कृष्ण जी की आरती: आरती कुंजबिहारी की
आरती कुंजबिहारी की, हर पद के अर्थ के साथ, जन्माष्टमी के लिए।